हार का सुख

क्या हर लड़ाई जीतना ज़रूरी है?
अपने घर में या बाहर,
अपनी बीवी या पति के साथ,
अपने बच्चों के साथ,
या अपने मोहल्ले में, दोस्तों के साथ,
या फिर दुश्मनों के साथ?

जीतने में भरपूर आनंद ज़रूर है,
लेकिन कब तक?
जब तक दूसरा विवाद सामने खड़ा न हो,
जब तक दूसरी लड़ाई की पुकार सुनाई न दे।

क्या हारने का सुख आपने कभी अनुभव किया है?
जहाँ आपके थोड़ा सा पीछे हटने से
दूसरों को शांति या सुकून मिलता है।
जहाँ हार के बदले में आपको दूसरों की दुआएँ मिलती है।

क्या आपके अंदर कुछ अच्छा सा लगने लगता है,
क्या आपके ज़मीर मृदू स्वरों में गुनगुनाने लगता है,
क्या ऐसा लगता है कि थोड़ा सा खोकर बहुत कुछ पाया है,
क्या इस हार से जीत की ख़ुशबू आने लगती है?

लड़ाई के मैदान में उतरने से पहले,
ज़रा सोचिए एकबार।
क्या जचता है आप पे उस क्षण,
शीतल पवन का समभाव या सुनामी का हुंकार।

सुबीर चक्रवर्ती
१ सितंबर २०२६


2 thoughts on “हार का सुख”

  1. Winning and losing are animal instincts while compassion and forgiveness are what separates us from them in our humanity. Nice message here Subir.

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