दोस्ती

ये दोस्ती भी क्या चीज़ है
जो दोस्त एक दूसरे से मिलते हैं सालों के बाद
पर लगता है यूँ
कि ये कुछ ही दिनों की बात

एक हॉस्टल में रहना
साथ ही खाना, साथ पीना
खेलना, कूदना, दिल बहलाना
सपनें भी साथ ही देखना

परीक्षाओं का बोझ जब आता सर पर
तब सोचते कि गंतव्य बहुत दूर
इम्तिहानों के पहाड़ पार करते थे
कर दोस्ती के हाथ मज़बूत

दारू की बोतलें कम थीं
और लोग थे ज़्यादा
फिर भी ख़ाली नहीं होता था
किसी का प्याला

सब इधर उधर बिछड़ गए
काम धंधे की खोज में
कई दोस्त सिधार गए
चले गए परलोक में

अब हम फिर मिल रहें हैं
फिर से पूछताछ कर रहें हैं
याद कर रहें हैं उन दिनों को
भूले, बिछड़े सब यारों को

जब हसीयों की कलकलाहट
टकराती थी दीवारों से
जब कहते थे बहुत कुछ
और समझते कम थे

ये दोस्ती भी क्या चीज़ है
जो भुलाए नहीं भूलती
ये दोस्ती भी क्या चीज़ है
जो मिटाए नहीं मिटती

सुबीर चक्रवर्ती / १ नवम्बर २०१८


One thought on “दोस्ती

  1. Beautiful!!khub bhalo laglo .eta pore Amar Anek bondhuder katha mone porlo Jara akhonare are Dunia te nei, ar jara achen age problem er Janna dekhao hoyna. Mishima

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