ये कैसी तरक्की
एक ज़माना ऐसा था
जब हम बिना कुछ सोचे
नल का पानी पीते थे
बेझिझक पिलाते भी थे
और अब ऐसा ज़माना आया है
जब हम पानी खरीदते हैं
हमेशा डर लगा रहता है
इन्फ़ेक्शन से डरते हैं
खुलकर साँस लेते वक़्त
दूषण का ख़याल आता है
फेफड़ों की हालत देखकर
ईश्वर भी रोता है
कहते हैं कि हम तरक्की कर रहें हैं
पर ये कैसी तरक्की
जो पानी में विष घोल दे
बदल दे हवा की परिचिति
ये कैसी तरक्की
जो प्रदूषण से पीड़ित होकर
लाए आँखों में आँसू
मिटा दे हमारी जीने की आरज़ू
सुबीर चक्रवर्ती / ११ नवम्बर २०१८

