पूरी ज़िंदगी निकल गयी
एक ही हिसाब के पीछे
कि कितना खोया
और कितना पाया
जीवन आगे चलता गया
और मैं गणित करता गया
कि कहीं पाने की सारी ख़ुशियाँ
खोने के आँसूओं में बह तो नहीं गया
कहीं इस जीवन युद्ध में
मैं हार तो नहीं गया
कहीं मेरे रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त
आगे तो नहीं निकल गए
सायंकाल में खाता खोलकर सोचता हूँ
क्या पाने की ख़ुशी के आगे
खोने का ग़म कुछ ज़्यादा था
या फिर दोनों में बराबरी का मुक़ाबला रहा
हिसाब किताब के अंतिम काल में
जब खो देंगे अपने शरीर, होशोहवास
क्या पायेगा उसके बदले में
सुख, चैन, शान्ति या नर्कवास
सुबीर चक्रवर्ती / ४ डिसेम्बर २०१९

The dilemma of life, captured nicely. Very nice!
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Bahut sahi kaha hai aapne!! Aap ka dosti paakar hum tho bahut kuch paayein hai Subirda!!
Rama
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Thanks Rama for your comments, which I value greatly!!
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