ख़ामोशी

क्या ख़ामोशी, ख़ामोशी से बात कर सकती है
तुम्हारी ख़ामोशी मेरी ख़ामोशी से
या फिर अपने आप से
या फिर किसी से भी नहीं

कभी यह ख़ामोशी चीख़ चीख़ कर कहती है
तुम्हारा नाम
क्या तुम्हारी ख़ामोशी को सुनाई देती है
मेरी अनकही पुकार

पता नहीं मुझे
इसलिए अक्सर पूछता हूँ अपनी ख़ामोशी से
कि क्या उसे भी उत्कंठा होती है
क्या उसका दिल भी धड़कता है

क्यों मुझे ऐसा लगता है
कि मेरी ख़ामोशी की भी जान है
उसकी एक अलग बोली है
एक अलग मनोहर पहचान

जो मेरी पहचान की नींव है
उसका अस्तित्व, उसकी सच्चाई
हृदयवीणा का सुर संगम
मेरी आत्मा का मधुर स्पंदन

सुबीर चक्रवर्ती / १९ नवम्बर २०१९


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