झोली

ज़िन्दगी के हर मोड़ पर
करते क्या हैं हम
सिर्फ़ इकट्ठा करते रहते हैं
दौलत, ख़ुशी और ग़म

इसी तरह देखते देखते
भर जाती है झोली
लेकिन मन मानने से नाराज़
रुकने की है देरी

कोशिश यही रहती है
कि कैसे करें और बड़ी
उस प्यारी झोली को
जो लगभग भर चुकी

झोली के बोझ ढोते ढोते
कमर टूट जाए फिर भी सही
ख़ुशी थोड़ी कम भी मिले
उसमें कोई ग़म नहीं

और जो कुछ भी है इस जीवन में
कहाँ दे सकते हैं वक़्त
पीछे रह जातें हैं सब
रिश्ते, भाईचारा, मोहब्बत

जीवन के सायंकाल में
न झोली रहेगी, न पहचान
जाना सबको एक दिशा
जल उठेगा श्मशान

सुबीर चक्रवर्ती / ३० अक्टूबर २०१८


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