क्यों

क्यों इस दिवाली में ऐसा लग रहा है
कि पटाखे न फोड़ूँ, फुलझड़ियाँ न जलाऊँ
क्यों ऐसा लग रहा है
कि कुछ अलग करके दिखाऊँ

क्यों इस काली पूजा के अवसर पर
लग रहा है यूँ
कि इस बार प्रतिमा को समर्पित
गंगा मैया में न करूँ

क्यों ऐसा लग रहा है
कि हमारा वातावरण रो रहा है
इस दूषित धुआँ से जर्जरित होकर
अपनी आख़री साँसें ले रहा है

क्यों ऐसा लग रहा है
कि गंगा मैया भीख़ माँग रही है
उज्जीवित, उछलती जलधारा
आज रुक रुक के बह रही है

क्यों ऐसा लग रहा है
कि इस बार ख़ुशियों की मोमबत्तियाँ जलाऊँ
क्यों ऐसा लग रहा है
कि माँ काली की मूर्ति दिल में सजाऊँ

ता कि बड़े बुज़ुर्ग आवाज़ से न तड़पें
ता कि हवा खुल के हँस सके
ता कि गंगा मैया का आँचल लहराता रहे
ता कि मनुष्य जाति नवजीवन पा सके

सुबीर चक्रवर्ती / १९ अक्टूबर २०१९


2 thoughts on “क्यों

  1. I wish everyone would internalize your wonderful words and adopt your actions, Subir. That will give these celebrations their true meaning and also help save all of us so we can celebrate longer!

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