दौड़-धूप

इस ज़िन्दगी के सफ़र में
तू भी मुसाफ़िर, मैं भी मुसाफ़िर
चल रहें हैं, भटकते, कतराते
ख़ुशियों की खोज में
महफ़िलों की तलाश में

कानों में गूँज रही हैं
पैसों की झंकार
दौड़ रहें हैं सब उसके पीछे
पता नहीं खोजते खोजते
कब लापता हो गये हम

लापता अपनों से, ख़ुद से
लेकिन फिर भी
ज़िंदगी जी रहें हैं
साँसें चल रही हैं
दिल धड़क रहा है

आँखें आज भी खोज रही हैं
उन ख़ुशियों को, उन महफ़िलों को
जो मिलकर भी न मिला
पाकर भी न पाया
मरिचिका बनकर सब रह गया

दौड़ते दौड़ते थक गये हैं हम
अब रूकने की चाहत है मन में
लेकिन रुक नहीं सकते
कुछ पैसों का लालच अब भी बाकी है
और कुछ आदत की मजबूरी है

सुबीर चक्रवर्ती / २९ अक्टूबर २०१८


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