होली के एक दिन बाद

कैसा लगता है होली के एक दिन बाद
जब सब रंग उतर जाता है
जब अपना चेहरा फिर से दिखने लगता है
जब अपना प्रतिबिंब आइने के उस पार से
कुछ सवाल खड़ा करता है

इस प्यार और भाईचारे के त्योहार को
क्यों हम एक दिन तक ही सीमित रखें
क्यों भाईचारा जताने के लिए
रंग का सहारा लेना पड़े
चेहरे को छुपाना पड़े

क्या प्यार बाँटने के लिए
चेहरा छुपाना ज़रूरी है
क्या भाई से गले लगाने के लिए
रंग से लिपटना ज़रूरी है
क्या ख़ुद को ना पहचानना ज़रूरी है

पता नहीं क्या सही है और क्या नासही
पर इतना ज़रूर जानता हूँ
चेहरे पे रंग रहे या न रहे
एक दिन आगे हो या पीछे
हर दिन मेरे लिए होली ही है

सुबीर चक्रवर्ती / २१ मार्च २०१९


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