वक़्त

जीवन में वक़्त एक ऐसा आया
कि वक़्त को ढूँढने निकल पड़ा
वक़्त के आगे, वक़्त के पीछे
वक़्त के बीच मंडराने लगा

किसने देखा इस वक़्त का चेहरा
जो किसी के लिए रूकता नहीं
आगे की दिशा में चलता है
किसी के सामने झुकता नहीं

फिर भी साहस इकट्ठा कर
वक़्त से पूछा एक सवाल
कैसे चलते रहते हो रात दिन
कैसे करते हो ये कमाल

वक़्त ने कहा ज़रा सा हंसकर
ज़रा सा आकर पास
कानों में स्पष्ट सुनाई दिया
उसकी गूँजती हुई आवाज़

ज़िंदगी को खुलकर जियो
अपने दोस्त परिजनों के साथ
हर पल को दिल से सँवारों
हर क्षण से करो प्यार

और बाकि बची, खुशी, ग़म
जो आएँगी घूम फिर के बार बार
न खुशी से फूलो , न ग़म से डरो
ये तो सिर्फ़, वक़्त वक़्त की बात

सुबीर चक्रवर्ती / २७ फरवरी २०१९


3 thoughts on “वक़्त

  1. Subir,
    You are a philosopher writing in poetic form … about mindfulness, relationships and spirituality. Keep it going buddy.
    Your fan,
    Koushik

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  2. Superb poetry in very nice easy to understand and strike directly to mind.Please think to write full poetry book for future as your imagination catching both existing senior and young population. Kudos and my best wishes 🤗🤗🤗

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