समझौता इक्स्प्रेस

अब किस किस से समझौता करूँ
अपने काम से, अपनी परिस्थितियों से
अपने परिवार से, ख़ुद से
अब थोड़ी सी थकान महसूस होती है
अब दिल और ही कुछ चाहने लगा है

सोचता हूँ
क्या होगा इस उम्र में, अगर
मैं सिर्फ़ ख़ुद के लिए ही सोचूँ
दूसरों से नाता तोड़कर
प्रकृति से जोड़ूँ

प्रकृति की सौंदरता को क़रीब से परखूँ
पक्षियों के सरगम को ज़रिया बनाकर
उनके मधुर स्वरों में विलीन हो जाऊँ
ऊँचे आसमान को साक्षी मानकर
नील गगन में खो जाऊँ

अब दिल चाहता है
कि मैं खुली हवा में साँस लूँ, और
दिल की धड़कनों के साथ धड़कता रहूँ
अब दिल चाहता है
कि मैं समझौता से समझौता करूँ

सुबीर चक्रवर्ती / २४ फरवरी २०१९


One thought on “समझौता इक्स्प्रेस

  1. सुबीरदा! इतनी सुंदर कविता मैंने कभी नहीं पढी। आपकी आध्यात्मिकता आपकी लिखी पन्क्तियोँ से उछल कूद के आँखों के सामने नाच रही हैं, कह रही हैं, आ, तू भी मेरे साथ आ, प्राकृति की सुंदरता मेंं हम साथ डूब जायेंगे, जष्ण मनाऐंगें!

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