बचपन में एक सलाह अक्सर सुनाई देता था
ख़ासकर बड़ों से, बुज़ुर्गों से, शिक्षकों से
कि, अच्छाई फैलाओ, अच्छा बनो
अपनी कीर्ति से अपना नाम रोशन करो
बचपन में इसका एक ही अर्थ होता था
न्याय और अन्याय के फ़र्क को समझना
बड़ों और शिक्षकों का इज़्ज़त करना
सही दिशा में अपने ज्ञान का प्रसार करना
जब बचपन से जवानी के तरफ बड़ा
तब देखा कि अच्छाई का अर्थ बदलने लगा
न्याय के सड़क में अन्याय झाँकने लगा
बड़ों की बातों से झूठ की बू आने लगा
बड़ों ने कहा कि अब तुम बड़े हो गए हो
जोश तो ठीक है, पर थोड़ा होश भी दिखाओ
जग की भलाई, देश की भलाई तो ठीक है
अब थोड़ी अपनी भलाई को आगे बड़ाओ
आज मैं बुढ़ापे के चौखट पर खड़ा हूँ
और यह आज तक समझ में नहीं आया
क्या सब की अच्छाई में मेरी अच्छाई नहीं है
क्या अन्याय से समझौता में ही समझदारी है
क्या बचपन की अच्छाइयों में बेवक़ूफ़ियाँ छिपे हैं
क्या न्याय के राह पर सिर्फ काँटें ही बिछे हैं
क्या अच्छाई की अच्छाई में कुछ मिलावट है
क्या दिल का सुनना इतना ही मुश्किल है
सुबीर चक्रवर्ती / ७ अप्रैल २०१९

The old values retain their relevance; only adherence to them has become harder. The road ahead is becoming narrower.
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I agree. The extent of divergence is getting increasingly pronounced in the present age.
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इस कविता की अच्छाई में कोई मिलावट नहीं सुबीर!
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